वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत
Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी
Verse 27 of 28
तू तौ मेरे प्राननि हूँ तै प्यारी।
नेंकु चितै हँसि बोलिये मोसौं, हौं तो सरन तिहारी॥ [1]
अंतर दूर करौ अँचरा की, खोलि देहु घूंघट-पट सारी।
‘कृष्णदास’ प्रभु गिरिधर नागर, भरि लीन्हें अँकवारी॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (828)
तुम मेरे प्रिय हो, मेरे प्रिय! नेंकु चितै हांसी बिये मोसौं, मैं सरन तिहारी.. [1] अंधियारे की दूरी मिटाओ, तन के सब परदे खोलो। 'कृष्णदास' प्रभु गिरिधर नागर, भारी लीन्हे अंकावारी.. [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (828)