वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत

Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी

Verse 4 of 28

छबि आछी बनबारी की। मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल अलिका घूंघर बारी की॥ [1] मृदु मुसिक्यान आन नयनन की को बरनौ गिरिधारी की। कृष्णदास जुगलजोरी पर तन मन धन सब बारी की॥ [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी छवि अच्छी बनी है. मोर मुकुट मकारित कुंडल, अलिका घुंघर बारी। [1] बरनौ गिरिधारी के मृदु संगीत और नयन। तन, मन, धन, सब शत्रु पर कृष्णदास जुगलजोरी.. [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी का संबोधन
ब्रज में रतन राधिका गोरीब्रज में रतन राधिका गोरी