ब्रज में रतन राधिका गोरी
Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी
Verse 3 of 28
(राग सारंग)
ब्रज में रतन राधिका गोरी।
हरि लीनी वृषभानु-भवन तें नंद-सुवन की चोरी॥ [1]
गूथी लर केस हेत कुसुमावलि, अरु सुरंग कचडोरी।
पिय-भुज कंध धरें सोभित मनु घन दामिनि-दुति जोरी॥ [2]
कालिंदी-तट केलि कुलाहल, सघनकुंज बन खोरी।
'कृष्णदास' प्रभु गिरिधर नागर नागरि नवल किसोरी॥ [3]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (102)
(राग सारंगा)ब्रज पुरुष रतन राधिका गोरी। हरि लीनि वृषभानु-भवन तेन नंद-सुवन की पुत्री। [1] गुथी लार केस हेत कुसुमावली, अरु सुरंग कचदोरी। पिया-भुज शोभित मनु घन दामिनी-दुति जोरि कांधे की ओर। [2] कालिन्दी-तभी कुल्हाल, गहनकुंज खोरी बनी। 'कृष्णदास' प्रभु गिरिधर नागर नागर नवल किसोरी.. [3] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी की वाणी (102)