आवत मोहन मन जु हर्यौ हौ
Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास
Verse 1 of 23
(राग धनाश्री एवं पूर्वी)
आवत मोहन मन जु हर्यौ हौ।
हौं गृह अपने सचु सों बैठी, निरखि वदन अस्वरा विसर्यौ हौ॥ [1]
रूप-निधान रसिक नंदनंदन निरखि वदन धीरज न धर्यौ हौ।
'कुंभनदास' प्रभु गोवर्धन धर अँग-अँग प्रेम-पियूष भर्यौ हौ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (187)
(राग धनश्री एवन पूर्वी) आवत मोहन मन जू हरयौ हौ। मैं अपने सच्चे पुत्र का घर हूँ, मैं संसारहीन संसार का विष बन गया हूँ। 'कुंभनदास' प्रभु गोवर्धन धर अंग अंग प्रेम-पीयूष भारयौ हौ.. [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुंभनदास जी की वाणी (187)