आये माई बरषा के अगवानी
Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास
Verse 2 of 23
(राग मल्हार)
आये माई बरषा के अगवानी।
दादुर मोर पपैया बोले कुँजन बगपाँत उद्वानी॥ [1]
घन की गरज सुन सुधि न रही कछु बदरन देख डरानी।
कुंभन दास प्रभु गोवर्धनधर लाल भये सुख दानी॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (346)
(राग मल्हारा) ओह, मैं बारिश का स्वागत करता हूं। दादुर मोर पपीता बोले, कुंजन बागपंत उड़वाणी..[1] गड़गड़ाहट की ध्वनि, गड़गड़ाहट की आवाज, कुछ बदरन देख कर भय नहीं। कुम्भन दास प्रभु गोवर्धनधर लाल भये सुखा दानी.. [2] - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (346)