श्री कुम्भनदास जी की वाणी

Kumbhandas Vani

श्री कुम्भनदास · 23 verses · Braj

  1. 1. आवत मोहन मन जु हर्यौ हौ
  2. 2. आये माई बरषा के अगवानी
  3. 3. बनी राधिका गिरधर की जोरी
  4. 4. भगतकौ कहा सीकरी काम
  5. 5. दम्पति दोउ राजत कुंज-भवन
  6. 6. मेरो मन तौ हरि के संग गयो
  7. 7. रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी
  8. 8. माई हौं गिरधरन के गुन गाऊँ
  9. 9. रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी
  10. 10. मेरो मन तौ हरि के संग गयो
  11. 11. नंद-नंदन की बलि-बलि जैये
  12. 12. न्यांइरी तू अलकलडी
  13. 13. पोढ़े हरि राधिका के संग
  14. 14. पोढे हरि राधिका के भवन
  15. 15. पोढ़े हरि राधिका के संग
  16. 16. प्रगटी नागरि रूप-निधान
  17. 17. प्रगटी राधा रूप निधान
  18. 18. रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी
  19. 19. रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी
  20. 20. सखी मोय बूँद अचानक लागी
  21. 21. रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी
  22. 22. तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ
  23. 23. यह गति नाँचि-नाँचि लई