यह गति नाँचि-नाँचि लई

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 23 of 23

यह गति नाँचि-नाँचि लई। वृन्दावनमें रास-विलास, सुख बाढ़त सई॥ [1] भाँति-भाँति राग गावत, सुर अलापत कई। उरप-तिरप मान लेत, ताता - तत - थई॥ [2] स्याम सुन्दर करत क्रीड़ा, प्रेम-छटा छई। कुंभनदास प्रभु गिरधर, छिनु-छिनु प्रीति नई॥ [3] - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी यह गति छोटी है. वृन्दावन हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण है... [1] विभिन्न प्रकार के राग और धुनें। उरपा-तिरप मन लेत, तत-तत्-थाय.. [2] स्याम सुन्दर करत क्रीड़ा, प्रेम-चटा है। कुम्भनदास प्रभु गिरधर, छीनु-छिनु प्रीति नै.. [3] - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी
तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ