तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 22 of 23

(राग विलावल) तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ मैं विचारि के कौउ नाहिन भामिनि। [1] कहा बापुरो कंचन, कदली, कहा केहरि, गज, कपोत, कुंभ, पिक कहा चंद्रमा कहा वापुरि दामिनि?॥ [2] कहा कुरंग, सुक, बंधूक, केकी, कमल या आगें श्री देखिये सब की नि:कामिनि॥ [3] मोहन रसिक गिरि-धरण कहत ‘राधे’! परम भावंती तू है ‘कुंभनदास’ स्वामिनि॥ [4] - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (168) (राग विलावाला) तेरे शरीर की समानता कौन देख सकता है, मैं विचारक नहीं भामिनी। [1] कहां बापुरो कंचन, कहां कदली, कहां केहरि, गज, कपोत, कुंभ, पिक, कहां चंद्रमा, कहां वापुरी दामिनी?.. [2] कहां कुरंग, सुक, बंधुक, केकी, कमल या श्री, देखो सबकी निकम्मी.. [3] मोहन रसिक गिरि-धरन कहते हैं 'राधे'! आप परम पूज्य 'कुम्भनदास' स्वामी हैं.. [4] - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास जी के वचन (168)
रस में रहत गढ़ी हो रसिकनीयह गति नाँचि-नाँचि लई