रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी
Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास
Verse 9 of 23
मनमोहन मनमोहना, मनमोहन मन माहिं।
या मोहन ते सोहना, तीन लोक में नाहीं॥
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी
मनमोहन मनमोहन, मनमोहन मन माहीं। या मोहन ते सोहाना, तीन लोक में नहीं.. - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास जी के वचन