मेरो मन तौ हरि के संग गयो

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 10 of 23

(राग नट) मेरो मन तौ हरि के संग गयो। नांहिन काहू कों दोस री माई, नैननि के घालें पर-बस भयो ॥ [1] नंद-कुमार जब हीं दृष्टि परे, स्यामरूप अपने द्वार ह्वै अंतर लयो। 'कुंभनदास' प्रभु गिरिधरन कों कहा हौं कहोंरी, इननु अपबल मूसि दयो॥ [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (233) (राग नाता) मेरा मन हरि के साथ चला गया। नन्हा सा जो मेरी माँ का सखा है, मैं तो अपने मायके से परे हूँ... [1] नन्द-कुमार, जब दृष्टि हो परे, अन्तर्यामी रूप को अपने द्वार ले आओ। 'कुंभनदास' प्रभु गिरिधरन, कौन कहूं इनानु अबल मुसि दयो.. [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुंभनदास जी के वचन (233)
रस में रहत गढ़ी हो रसिकनीनंद-नंदन की बलि-बलि जैये