परसाद विहारिनि रानी कौ
Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव
Verse 18 of 35
प्रिया बिन सुद्ध प्रेम नहीं पावै। [1]
भुव मंडल बैकुंठलोक की लौं उँच नीच केतौ किन धावै॥ [2]
एतौ मिलैं मिल्योई चाहत छिन छिन प्रीतम रंग बढावै। [3]
श्रीकुंजबिहारिनि ललित लाडिली तन मन वचननि हियो सिरावै॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (45)
प्रियतम के बिना शुद्ध प्रेम नहीं हो सकता। [1] पृथ्वी के ब्रह्माण्ड की ज्वाला ऊंची-नीची उठती रहती है.. [2] जब मैं तुमसे मिलता हूं, तो मैं चाहता हूं कि तुम मुझे प्यार करो। [3] श्री कुंजबिहारिणी ललित लाडिली तन मन वचनानि हयो सिरवै.. [4] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत पाद (45)