परसाद विहारिनि रानी कौ

Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव

Verse 19 of 35

प्रिया कहा करें मन बस नाँही। [1] करनी कछू बनै नहिं मोपै मन बच क्रम सब अवगांही॥ [2] एक उपाय एही है स्वामिनि अपनी जानि गहो बांही। [3] श्रीहरिदास रसिक अनन्य बिन और ठौर हमकों नाँही॥ [4] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (59) प्रिया, तुम्हें जो अच्छा लगे, कहो नन्ही। [1] मैं कुछ भी नहीं करना चाहती, मुझे अपने मन की परवाह नहीं, मुझे हर चीज की परवाह नहीं... [2] एक उपाय यह है कि मैं मेरी रखैल बन जाऊं। [3] श्री हरिदास रसिक अन्य बिन और ठौर हमको नहीं.. [4] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, पद्य के सिद्धांत (59)
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