परसाद विहारिनि रानी कौ
Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव
Verse 4 of 35
हमारी लड़ैती साहिबिनी,
जाके लाल अधीन सदाई ऐसी है परवीनी।
रोम रोम आनंद भरी है छिन्न छिन्न रूप नवीनी॥
श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि ललित केलि रस भीनी।
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, रस के पद (104)
ऐसी हैं जेके लाल अधीन सदय के नेतृत्व में हमारी जुझारू बहन परवीन। रोम-रोम में आनंद भारी, पतला-पतला, नया रूप। श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि ललित केलि रस भीनी। - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, रस के छंद (104)