परसाद विहारिनि रानी कौ

Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव

Verse 5 of 35

हमारी नित्य लडैती प्यारी। [1] जाकी प्रीति नई नई छिन्न छिन्न रोम रोम हितकारी॥ [2] अद्भुत रूप रंग कौ सागर जीवनि प्राण अधारी। [3] श्री हरिदासी ललित किसोरी कबहूँ होति न न्यारी॥ [4] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (64) हमारी रोज की लड़ाई प्रिये. [1] क्योंकि प्रेम नहीं है, रोम-रोम में हितकारी है.. [2] अद्भुत रूप, रंग, प्राण, प्राण, जड़। [3] श्री हरिदासी ललित किशोरी कब अद्वितीय हो जाती हैं? [4] - श्री ललित किशोरी देव के वचन, सिद्धांत, श्री ललित किशोरी देव जू (64)
परसाद विहारिनि रानी कौपरसाद विहारिनि रानी कौ