परसाद विहारिनि रानी कौ
Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव
Verse 6 of 35
हमारी रसिक सिरोमनि प्यारी।
लीयै सुभाव रहत निसिवासर तन मन अति हितकारी॥ [1]
जोई जोई रुचै करै पुनि सोई जीवनि प्रान अधारी।
श्रीहरिदासी ललित किसोरी छिनं हूँ होति न न्यारी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (66)
हमारी सुस्वादु चाँदी प्रिय। यह शरीर और मन के लिए शुभ और लाभकारी है। [1] जो तुम्हें अच्छा लगेगा, वही तुम बार-बार करोगे, तुम्हारा जीवन जीवन पर निर्भर रहेगा। श्री हरिदासी ललित किशोरी छिन हुन होति न न्यारी.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत पद (66)