परसाद विहारिनि रानी कौ
Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव
Verse 7 of 35
(राग गौरी)
जय जय श्री वृन्दावन चन्द।
महारूप सुखरासि छवीले, नित ही विहरत आनंद-कंद॥
जामें वसि जे अनंत देत चित, तेई हैं मति-मंद।
रसिकसिरोमनि श्री हरिदासी, कीने सहज प्रेम के फंद॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (50)
(राग गौरी) जय जय श्री वृन्दावन चंद। महरूप सुखरासि छविले, नित हि विहार आनंद-काण्ड.. जामेन वासी जे एनएनटी तिथि चित, ति है मति-मंद। रसिकसिरोमणि श्री हरिदासी, सहज प्रेम का खजाना.. - श्री ललित किशोरी देव के शब्द, सिद्धांत, श्री ललित किशोरी देव जू (50)