प्रीति की रीति रसिकनी जानैं
Madhury Shata — श्री वंशी अलि
Verse 11 of 13
प्रीति की रीति रसिकनी जानैं।
या ही ते लालन कौं तोषत, पोषत नित नैंकहु मान न ठानैं॥ [1]
अति अनुराग बढ़ावत छिन-छिन, राखत रसिक लुभानैं।
(जैश्री) वंशीअलि ललिता की कान सौं, करत सरस सनमानैं॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (24)
प्यार के तरीके जानो, प्यार का सार जानो। ये ही ते ललन कौन तोषट, पॉश नित नैनकहु मन न थनैन.. [1] अति अनुराग बधावत छीना-छिन, रखत रसिक लुभानैन। (जयश्री) वंशी अली ललिता की कान सौं, करत सरस सन्मानैन.. [2] - श्री वंशी अली, माधुरी शत (24)