कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी
Madhury Shata — श्री वंशी अलि
Verse 3 of 13
गोरी रूप सुधा रस बरसत।
पीवत तृषत लाल चात्रक ज्यों नैंननि पुलिकन हरषत॥ [1]
प्रेम बेलि उलही ललितादिक कुसुम चषनि सुख निरषत।
(जै श्री) वंशी-सखी नेह जल उमड़नि बोरि सकल मति करषति॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (32)
बारिश के कारण मेले की रौनक और बढ़ गयी है. पिवत् त्रिषत् लाल छत्रक ज्यों नैननानि पुलिकं हर्षत्।।[1] प्रेम बेलि उल्हि ललितादिक कुसुम चाशनी सुख निराशा। (जय श्री) वंशी-सखी नेह जल उमदानी बोरी सकल मति कर्षति.. [2] - श्री वंशी अली, माधुरी शत (32)