कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी

Madhury Shata — श्री वंशी अलि

Verse 5 of 13

कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी। मोहन मन मोहनी मोहन की, निसदिन रहत बनी॥ [1] भृकुटी चांप मधि नैंन जुगल सर, काजर रेख अनी। करि आपुन आधीन रसिक चित, अन तिय कलह हनी॥ [2] राजत कुंज महल रस रानी, लालन गुननि भनी। जय श्री बंशी अलि की जीवन श्यामा, अविचल नाथ मनी॥ [3] - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (8) कसुनबी ने सारे कपड़े पहन रखे हैं. मोहन के मन मोहन, निशादिन रहत बानी..[1] भृकुटि चैंप मधि नैन जुगल सार, काजर रेख आनी। अपने कामुक मन को हानि पहुँचाओ, शाश्वत कलह। [2] रजत कुंज महल रस रानी, ​​लालन गुणनि भानी। जय श्री बंशी अली की जीवन श्यामा, अविचल नाथ मणि.. [3] - श्री बंशी अली, माधुर्य शत (8)
कसूंबी सारी पहरें सोधें सनीलालन मन राग भाल बैंदी लाल