हम बालक तुम माय हमारी

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 1 of 65

(राग भैरव) (दोहा) एकहि तन मन एक ही, साँचे ढरी सुढंग। जोरी अद्भुत दुहुन की, रँगी सहज सुखरंग॥ (पद) सहज सुख रंग की रुचिर जोरी। [1] अतिहि अद्भुत कहूँ नाहि देखी सुनी सकल गुन कला कौसल किसोरी॥ [2] एकहि द्वै जु द्वै एकही दिपहिं दिन किहिं साँचे निपनई करि सुढोरी। [3] श्रीहरिप्रिया दरस हित दोय तन दरसवत एक तन एक मन एक दोरी॥ [4] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (1) (राग भैरव) (दोहा) एक तन और मन, एक प्राण और एक प्राण। प्यार का एक अद्भुत बंधन, आसान खुशियों का रंगीन.. (कविता) आसान खुशियों का एक रंगीन बंधन। [1] कहां नहीं देख सकते सबसे अद्भुत, सुनिए किसोरी के सकल गुण, कला, कौशल, प्रतिभा.. [2] एक दिन, एक दिन, दो दिन, एक दिन, एक दिन, कोई सांचा अपनाना है, कोई सांचा सुधारना है। [3] श्री हरिप्रिया दरस हित दोय तन दर्शवत, एक तन, एक मन, एक तार.. [4] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (1)
सुखकारी सबके सदा