मोरी अँखियाँ लगी रहौ नित और अभिलाष न चहौं ।
Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य
Verse 13 of 65
मोरी अँखियाँ लगी रहौ नित और अभिलाष न चहौं ।
धन्य भाग मनाय महलनि टहल में ततपर रहौं॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सूरत सुख (27)
हमेशा अपनी नजर मुझ पर रखो और इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहो. अनेक महलों के धन्य भाग में तैयार रहें.. - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (27)