जै जै आनन्द कन्दनी, श्रीहरिप्रिया किसोरि

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 31 of 65

(राग गौरी) (दोहा) जै जै आनन्द कन्दनी, श्रीहरिप्रिया किसोरि। जै जै राधा रसिकिनी, रसिक बिहारी जोरि॥ (पद) जै जै राधा रसिकिनी। रसिक बिहारी जोरी बनी॥ [1] जै जै स्यामा लाड़िली। मन मोहन मन चाड़िली॥ जै जै रूप उजागरी। नित्य नवीना नागरी॥ [2] जै जै आनन्द कन्दनी। जन जीवनि जग बन्दनी॥ जै जै सब सुख धामिनी। श्रीहरिप्रिया जै स्वामिनी॥ [3] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा-सुख (48) (दोहा) श्रीराधा रसिकनी और रसिक-बिहारी की इस युगल-छवि की सदा जय हो। ये श्रीहरि और श्रीप्रिया परमानन्द के मूल-स्वरूप हैं और नित्य ही किशोर अवस्था में सुशोभित रहते हैं। (पद) श्री राधा रसिकिनी और रसिक बिहारी की इस जोरी की सदा जय हो। [1] श्री श्यामा लाड़िली की जय हो जो मन मोहन की चाह की मूर्ति हैं। प्रकाशमान रूप वाली श्रीप्रियाजू की जय हो जो नित्य नवीन नागरी स्वरूप हैं। [2] आनन्द की भी मूल स्वरूपा श्रीलड़ैतीजू की जय हो जो जग-वन्दन श्रीलालजू की भी वन्दनीय हैं। सब सुख धाम स्वरूपा श्रीप्यारीजू की जय हो जो श्रीहरिप्रियाजू की स्वामिनी हैं। [3]
(दोहा)सुखकारी सबके सदा