सुखकारी सबके सदा
Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य
Verse 37 of 65
(दोहा)
प्रान प्रितम की प्रीतमा, स्वामिनि सुखनि सनी जु।
जय श्री बिहारिनि लाड़िली, रवनी रसिक बनी जु॥
(पद)
जय श्रीराधिका रवनी।
प्रानप्रीतम की प्रिया जय कलस्वनी कवनी॥ [1]
जय श्रीबिहारिनि लाड़िली जय रसिक जोरी बनी।
स्वामिनी सुखसनी श्रीहरिप्रिया दुखदवनी॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (59)
(दोहा)
हे प्राणप्रियतम की प्रियतमा स्वामिनी जू! हे श्री विहारिणी लाड़ली जू, हे रसिक रमणी जू! आपकी जय हो। लाल को सुख प्रदान करके आप ही वास्तविक सुख से सनी हुई हैं।
(पद)
हे श्रीराधिका हे रमणी जू, हे प्राण प्रियतम की प्रियाजू, हे मधुर भाषिणी कमनीयजू, आपकी जय हो। [1]
हे श्रीविहारनि लाड़लीजू, आप और लाल की जोड़ी ही उपयुक्त जोड़ी है। हे स्वामिनीजू, हे प्रिया जू, आप ही श्रीहरि के अतृप्ति जन्य दुखों को दूर करके उनको सब प्रकार से सुख प्रदान करने वाली हो। [2]