अलबेले आँगन खरे, अंस अंस भुज धारि।

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 55 of 65

अलबेले आँगन खरे, अंस अंस भुज धारि। लै दरपन दिखरावहीं, ह्वै सन्मुख सहचारी॥ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सेवा सुख चाहे कोई भी आंगन हो, हर हिस्सा हथियारों से लैस है. दर्पण तो केवल दिखाने के लिए है, सामने तो साथी है.. - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख
यह रस दुर्लभ हूँ ते दुर्लभ, सुलभ नित्य रहत है ताहि। एक स्वरूप सदा द्वै नाम॥