(दोहा)

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 7 of 65

(दोहा) जो कछु सो तुव चरन बल, नहिं मेरो उपकार। मोहिं बड़ाई देति हौ, अहु स्वामिनी सुखसार॥ (पद) अहो बलि स्वामिनी सुखसार। जो कछु सो सब पद प्रताप करि, मोहि देत अधिकार॥ [1] तुम कारन के कारन तुमहीं, करता के करतार। श्रीहरिप्रिया प्रान-जीवन-धन, तन मन के आधार॥ [2] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (17) (दोहा) हे सुख-स्वरूपा स्वामिनी जू (श्री राधा)! जो कुछ प्रताप है, वह आपके इन युगल-चरणों का ही है। इसमें मेरा कोई उपकार (सामर्थ्य) नहीं है। आप केवल अपनी उदारता के कारण ही मुझे बढ़ाई दे रही हैं। (पद) हे सब सुखों की सार स्वरूप श्रीस्वामिनिजू मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ। यह जो कुछ निकुञ्ज विलास का रस है, ये सब आपके चरणारविन्दों की कृपा से है। मुझको तो आपने अपनी उदारता से अधिकार प्रदान कर रखा है। [1] दिव्य प्रेम के कारण स्वरूप एवं संचालक आप ही हैं। हे श्रीहरि की प्रिया लड़ैती जू आप ही मेरे प्राण जीवन धन तन मन के आधार स्वरूपा हैं। [2]
सुखकारी सबके सदाजो कछु सो तुव चरन बल, नहिं मेरो उपकार।