सुखकारी सबके सदा
Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य
Verse 9 of 65
॥दोहा॥
अङ्ग अङ्ग नागर नवल, पहरि कमल की माल।
मेरे हिय में सुख-सनें, बिलसौ दोऊ लाल॥
॥पद॥
बिलसौ दोउ लाल मेरे हिय-सदन सुख-सने। [1]
सुरत-रस-लीग अङ्ग अङ्ग नागर नवल,
कमल की माल लहलही डहडह तने॥ [2]
मुकुट की लटक अरविन्द-पद परसिनी,
सरसिनी समर अद्भुत सु आनन्दघने। [3]
श्रीहरिप्रिया ललित उरसौं मिली झिलिमिलि,
दिलिमिली दिपति दुति जोर जोबनजने॥ [4]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (19)
..दोहा.. अंग अंग नगर नवल, पहाड़ी अद्भुत माल। मेरा मन सूखा, बिलासौ दोऊ लाल....पी.. बिलासौ दोऊ लाल, मेरा घर सूखा। [1]. [3] श्री हरिप्रिया ललित उर्सौं मिलि झिलिमिली, डिलिमिली दीप्ति दत्ती जोर जोबांजने.. [4] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (19)