छाँड़ि नेह नंदलाल कौ हम नहिं चाहत जोग
Matiram Satsai — श्री मतिराम
Verse 2 of 10
ब्रज ठकुरानी राधिका, ठाकुर किए प्रकास।
ते मन मोहन हरि भए, अब दासी के दास॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (395)
ब्रज ठकुरानी राधिका, ठाकुर की ज्योति। ते मन मोहन हरि भाई, अब दासी के दास.. - श्री मतिराम, मतिराम सतसई (395)