मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ

Mohan Mohini — श्री बिंदु जी

Verse 4 of 6

मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ। उसी झलक पर खिंचा जा रहा हूँ॥[1] लुटाता है वह, मैं लुटा जा रहा हूँ। मिटाता है वह, मैं मिटा जा रहा हूँ॥ [2] खबर कुछ नहीं है कहाँ जा रहा हूँ। बुलाता है वह मैं चला जा रहा हूँ। [3] मोहब्बत से मैं यूं चला जा रहा हूँ। निगाहों में उसकी बसा जा रहा हूँ॥ [4] पता प्रेम के सिन्धु का पा रहा हूँ। कि एक बिन्दु में ही बहा जा रहा हूँ॥ [5] - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी मैं घनश्‍याम को देख रहा हूं। मैं इसकी एक झलक की ओर खिंचा चला जा रहा हूं..[1] वाह, मैं तो लूट रहा हूँ. वाह, मैं गायब हो रहा हूं.. [2] पता नहीं मैं कहां जा रहा हूं। वह फोन करता है, वाह, मैं जा रहा हूं। [3] मैं प्रेम के कारण इस ओर जा रहा हूं। मैं उसकी आँखों में बसता हूँ.. [4] मुझे प्यार का सागर महसूस होता है। कि मैं एक बिन्दु में बह रही हूँ.. [5] - श्री बिन्दु जी, मोहन मोहिनी
मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँमैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ