रंगीली गलिन बिच हो हो होरी।

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Verse 12 of 23

रंगीली गलिन बिच हो हो होरी। इत नंदनन्दन रसिक लाड़िलो, उत वृषभान किसोरी॥ [1] उड़त गुलाल कछु नहीं सूझत, झकझोरा झकझोरी। नागरीदास परसपर ढारत, भर भर कनक कमोरी॥ [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143) तुम एक रंगीन लड़की हो. ये नंदनंदन रसिक लैलाओ, वो वृषभान किसोरी.. [1] उड़ता गुलाल कछुआ नहीं समझता, झकाझोरा झकाझोरी। नागरीदास परस्पर धरती, भर भर कनक कमोरी.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143)
Pyari Ke Pain Lal Javak Dainश्री वृषभानु कुल की, भूषन जगत अभूत।