जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न

Nagaridas Extras —

Verse 3 of 23

कबै झुकत मो ओर कौं, ऐहैं मद गज चाल। गरबाँही दीने दोउ, प्रियानवल नन्द लाल॥ - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (10) कब और कौन झुकते हो, तुम मूर्ख यहाँ आते हो। गरबांहि दिन दोउ, प्रियमवल नंद लाल.. - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मंजरी (10)
जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं नजो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न