जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न

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Verse 4 of 23

जुगल रूप ऐसो चितैं, गिरिरह्वौ तन सुधि भूल। वे नूपुर झनकाय कैं, जैहैं जमुना कूल॥ - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (32) जुगल रूप ऐसो चितैन, गिरिरहौ तन सुधि भूल। कहाँ नूपुर झनकाय, कहाँ जमुना कुल.. - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मंजरी (32)
जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं नयह वृन्दावन यह समैं