बिहारिनि लाडिली सुख रासि

Nagaridev Vani — श्री नागरीदेव

Verse 15 of 15

(राग विलावल) बिहारिनि लाडिली सुख रासि। रूप अनूप महा मन मोहनी सहज छबीली हासि॥ [1] अंग अंग अनंग रंग स्याम संग विलसत मननि हुलासि। इहि रस मत्त मगन अनुदिन बलि जाइ नागरीदासि॥ [2] - श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (34) (राग विलावाला) बिहारिणी लाडिली सुख रासी। रूप न्यारा, मन मोहक, मुस्कान स्वाभाविक। [1] शरीर भी सुन्दर, रूप भी सुन्दर, सुन्दर ही सुन्दर, सुन्दर ही सुन्दर। इहि रस मत्त मगन अनुदिन बाली जय नागरीदासी.. [2] - श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के छंद (34)
अलमस्त रहैं अलबेले लाल, लाडिली के रसमाते