श्रीवृषभान नृपति के आंगन

Nanddas Granthavali — श्री नंददास

Verse 18 of 23

(राग आसावरी) श्रीवृषभान नृपति के आंगन, बाजत आज वधाई सो॥ कीरति देरानी सुखसानी सुता, सुलच्छन जाई हो॥ [1] भक्ति सर्ब दासी है जाकी, सियाहूते अधिक सुहाई हो। निरबध नेह अबधि रस मूरति, प्रगटी सब सुखदाई हो॥ [2] ब्रह्मादिक सनकादिक नारद, आनन्द उर न समाई हो। नंददास प्रभु पलना पोढ़े, किलकत कुँवर कन्हाई हो॥ [3] - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (53) (राग आसावरी) श्री वृषभान नृपति के आंगन, बाजत अज वधै सो.. किरति देरनि सुखसानि सुता, सुलच्छन जय हो.. [1] भक्ति सरब दासी है जाकी, सियाहुत्ते अधि सुहाई हो। अनंत खुशियों की कोई सीमा न हो, प्रगति हो, सारी खुशियां हों। [2] ब्रह्मादिक सनकादिक नारद आपका आनंद समाहित न हो। नंददास प्रभु ने पाला, किलकट कुँवर कन्हाई हो.. [3] - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (53)
पोढ़े श्याम श्यामा संगतेरी भौंह की मरौरन तें