छबीले नील घन की पूतरी

Nanddas Granthavali — श्री नंददास

Verse 3 of 23

(राग-गौड़ सारंग, ताल-झूमरा) छबीले नील घन की पूतरी क्रीड़त बृंदाबन माँहीं। बिबिध भूषन धरें बंसी अधर धरि चलत देखत परछाँहीं॥ [1] सबके हिय करषत, सोभा-बूँदन बरषत, गोपीजन-लोचन-चातक निरखत जिवाहीं। [2] नंददास कोऊ एक दामिनि-सी ढिंग ठाड़ी ताके गरें बर दियें बाँहीं॥ [3] - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली (राग-गौड़ा सारंग, ताल-झुमरा) क्रीदत बृंदाबन मनहिं, छबीले नील घन की बेटी। मैं बांसुरी को तरह-तरह के आभूषण पहने हुए और पृथ्वी पर घूमते हुए नहीं देखता। [1] सबके लिए सुख है, वर्षा सौंदर्य बरसा रही है, गोपीजन-लोचन-चातक अछूत प्राणी हैं। [2].
बेसर कौन की अति नीकीछबीले नील घन की पूतरी