जाकी मनमोहन दृष्टि परे

Narahari Dev Vani — श्री नरहरि देव

Verse 1 of 3

(राग सारंग) जाकी मनमोहन दृष्टि परे। सो तो भयो साँवन को अंधो सूझत रंग हरे॥ [1] जड़ चैतन्य कछु नहीं सूझै जित देखै तित स्याम खरे। विहवल विकल संभार न तन की घूमत नैना रूप भरे॥ [2] करनी अकरनी दोउ सुधि भूलि विधि निषेध सब रहे धरे। श्री नरहरिदास ते भए बावरे जे प्रेम प्रवाह परे॥ [3] - श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (1) (राग सारंगा) जाकी मनमोहन दृष्टि से परे। इसलिए जंगल अंधा है, रंग हरा है... [1] जब तक शाम साफ नहीं हो जाती, देखने वाले से ज्यादा होश में कोई नहीं होता। आचरण बिगड़ गया है, शरीर भटक रहा है, शरीर भटक रहा है, आँखों में आँसू भर रहे हैं... [2] एक-एक करके काम करना, नियमों को भूल जाना और हर चीज का निषेध करना। श्री नरहरिदास ते भे बावरे जे प्रेम बाहे पर.. [3] - श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (1)
खेलत रास लाड़िली लाल