खेलत रास लाड़िली लाल

Narahari Dev Vani — श्री नरहरि देव

Verse 2 of 3

(राग विहागरो) खेलत रास लाड़िली लाल। तान गान गुन सिखवति प्यारी, तहाँ न कोऊ बाल॥ [1] ताल मृदंग संगीत विधि उघटत, भूषन बजत रसाल। उरप तिरप चित लेत सुलप गति, उपजत सुख के जाल॥ [2] केलि कला रस बरसत हरसत, परसत प्रेम बिसाल। श्रीनरहरिदासि निकट सुख निरखत, स्याम सुभग उर माल॥ [3] - श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (11) (राग विहगरो) खेलत रस लड़ै लाल। तन गण गुन सिखवती प्यारी, तहां न कुओ बल.. [1] ताल मृदंग संगीत विधि उघट, भूषण बाजत रसाल। उरप तिरप चित लेट सुलप गति, उपजे सुख के जल। [2] केलि काल रस वर्षा संकट, परसत प्रेम बिसाल। श्री नरहरि दासी निकट सुख निरखत, स्याम सुभग उर माल.. [3] - श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (11)
जाकी मनमोहन दृष्टि परेश्री नरहरि दास निरखि तृण तोरति