विहारिणि सर्वोपरि शिरताज

Nikunj Keli Madhuri — श्री अली माधुरी

Verse 24 of 34

अब मन युगल चरन में अटक्यो। जन्म अनेक भये या जग में, धर्म कर्म में भटक्यो॥ [1] कृपा करी श्री नित्य किशोरी, विपन राज में ठटक्यो। रसिकन के संग रहस केलि सुनि, हिय आनंद में लटक्यो॥ [2] पायो मारग प्रेम प्रीति को, चित कौ संषय सटक्यो। अली माधुरी भई नचीता, दूर भयो भव खटक्यो॥ [3] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी अब मन युगल के चरणों में अटक गया है। जन्म अनेक भये या जग पुरुष, धर्म कर्म पुरुष भटक्यो.. [1] कृपया श्री नित्य किशोरी को प्रसन्न करो, विपन राज पुरुष भटक्यो। रहस्य प्रेमी के साथ सुनो, मैं आनंद में खो गया हूँ। [2] प्रेम की राह मिले, मन को सताए शंका। अली माधुरी भाई नचिता, दुर भयो भव खटक्यो.. [3] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केली माधुरी
भुजा परस्पर अंश देविहारिणि सर्वोपरि शिरताज