रसिकजन की मैं बलिहारी

Nikunj Keli Madhuri — श्री अली माधुरी

Verse 28 of 34

(पद रेखता) रसिकजन की मैं बलिहारी, पियाप्यारी जिन उरधारी। वृन्दावनधाम में डोलें, अमानी मानदे बोलें॥ [1] सबहि से प्रेम हितकारी, त्रिगुण से रीति जिन न्यारी। प्रेममें मगन गुण गावैं, माधुरी तिनको शिरनावैं॥ [2] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2) (पंक्ति दर पंक्ति) मैं रसिकजन पर बलिहारी हूं प्रियतम। वृन्दावनधाम घूमें, बोलें अमानी मंदे। [1] प्रेम सर्वहितकारी है, तीनों गुणों में अद्वितीय है। प्रेम आनंदमय है, राग आनंददायक है, राग आनंददायक है। [2] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2)
राखि दृढ़ भरोसो तोको पोषैगी जय श्रीराधाविहारिणि सर्वोपरि शिरताज