विहारिणि सर्वोपरि शिरताज

Nikunj Keli Madhuri — श्री अली माधुरी

Verse 29 of 34

श्रीविपिनराज महाराज प्रणतपालन यह नाम तिहारौ है। [1] जान अजान शरण को जैसे बालक मातु दुलारौ है॥ [2] मनवाञ्छित फलदेय सबन को कोटिक सुरतरु वारौ है। [3] प्रेम प्रवाह रसिकजन प्यारे, तिनकौ प्राण पियारौ है॥ [4] अलीमाधुरी के जीवनधन आदि अन्त रखवारौ है॥ [5] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री वृंदावन जू की विनय पत्रिका (25) श्रीविपिनराज महाराज प्रणतपालन नाम तिहारौ। [1] लोग अजनबियों की शरण लेते हैं जैसे एक बच्चे को उसकी माँ प्यार करती है.. [2] हर वांछित फल हर किसी के लिए एक अनमोल आशीर्वाद है। [3] प्रेमियों को प्रेम की धारा प्रिय है, जीवन का तिनका प्रिय है.. [4] अली, माधुरी के जीवन, धन आदि के परम रक्षक हैं। [5] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केली माधुरी, श्री वृन्दावन जू की विनय पत्रिका (25)
रसिकजन की मैं बलिहारीविहारिणि सर्वोपरि शिरताज