भुजा परस्पर अंश दे

Nikunj Keli Madhuri — श्री अली माधुरी

Verse 4 of 34

चाल हंस गति निरख कै, सखी नयन हर्षाय। निरखत चन्द्र चकोर इव, दोउन नयन बसाय॥ - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा (82) चलो, हंस की चाल दिखाई नहीं देती, मेरे मित्र की आंखें प्रसन्न हो जाती हैं। निरखत चन्द्र चकोर चतुर्थ, दून नयन बसय.. - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केली माधुरी, श्री निकुंज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा (82)
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