श्यामा चरण कमल की आस

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 1 of 108

कब तो भोरी स्वामिनी, यही रहे मन चाह। निरखूँ -परखूँ नित छवि, भरी प्रेम रस आह॥ - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (2) ऐसा कब होगा प्रिय मालकिन, यही तो मेरा दिल चाहता है। निरखुन-परखुन नित छवि, भारी प्रेम रस आह.. - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंज वेले], निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा (2)
श्यामा चरण कमल की आस