कीवे कहा पढ़वे को कहा फल
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 103 of 108
इन कुंजन विहरत नित ही नित।
सेवाकुंज पुंज छबि बरसत, हरषत निरखत हित जित ही तित ॥
जुगल किसोर रूप रसमाते, फूली सखी रहे चित ही चित ।
कृष्ण अली सो ये छबि जाचों, राचों परयो रहों जित ही तित ॥