श्यामा चरण कमल की आस

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 108 of 108

(कवित्त) रसिक रासेश, रासेश्वरी, हृदयेश्वरी, अब तो कृपा कोर, नैक मुस्कराईये। [1] जीवन तो बीत्यो जात ऐसे साँझ भोर रात, निज दासी शरण चरण, हियो सरसाईये॥ [2] राधा राधा सुखद नाम भोर सांझ ये ही काम, प्यारी तेरो निज धाम, करुना कोर आईये। [3] श्यामा गोपाल हित, चरण छोड़ जाऊं कित, ऐसी भोरी लाड़ो छोड़, कौन पास जाईये॥ [4] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (56) (कविता) रसिक रसेश, रसेश्वरी, हृदयेश्वरी, अब मुस्कुराओ वीर। [1] ऐसे ही कटती है जिंदगी, सांझ-सबेरे, मेरी दासी, तू शरण मेरी.. [2] राधा-राधा, सुबह-शाम मधुर नाम, यही मेरा काम प्रिय, मेरा धाम, करुणा के हृदय में आया हूं। [3].
श्रीराधामाधव रंगे सुरति रंग रस लीन