श्यामा, सूझत नहीं कछु मोहे
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 46 of 108
(राग विभास, त्रिताल)
हमारी लाड़ली अति ही भोरी।
अवगुन जन के गिनत न कबहूँ, कृपामयी वृषभान किशोरी॥ [1]
कैसेहु चरन-शरन में आवे, वेगहि कृपा करें करोरी।
श्रीगोपाल हित हरी स्वामिनी, शीश नवाओ पौरी॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (114)
(राग विभास, त्रिताल) हमारा प्रियतम अति सुन्दर है। दयालु वृषभ लड़की, मैं एक आदमी की बुराइयों को कैसे नहीं गिन सकती। [1] मैं उनके चरणों की शरण कैसे ले सकता हूँ, वे मुझे आशीर्वाद दें। श्री गोपाल हित हरि स्वामिनी, शीश नवावौ पौरि.. [2] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंज वेले], निकुंज रस वल्लरी (114)