कीवे कहा पढ़वे को कहा फल

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 71 of 108

जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि, निशिदिन शीश कौं नवाऊँ रसिकन में। सेवाकुञ्ज मण्डल पुलिन वंशीवट, निधिवन औ समीर धीर विचरौं मगन में॥ लता द्रुम हेरौं राधाकृष्ण कहि टेरौं,रज लपटाऊँ तन में और सुख पाऊँ मन में। एहो राधावल्लभ जू तुमही सों विनती है, जैसें बनै तैसें मोहि राखो वृन्दावन में॥ - अज्ञात जाति, धर्म और कुल का अभिमान त्याग कर प्रेमियों के चरणों में नित श्रद्धा से सिर झुकाऊँगा। मैं प्रेमपूर्वक सेवाकुंज, रासमंडल, यमुना पुलिन, वंशीवट, निधिवन और धीर-समीर आदि दिव्य स्थानों का दर्शन करूंगा। मैं वृक्षों और लताओं को देखकर राधा-कृष्ण को पुकारूंगा और शरीर पर रजाई लपेटकर मन में प्रसन्नता प्राप्त करूंगा। हे श्री राधावल्लभ! मेरी आपसे एक ही प्रार्थना है कि चाहे कुछ भी हो जाए, कृपया मुझे सदैव वृन्दावन में ही रखना। - अज्ञात
इन कुंजन विहरत नित ही नित।सुखकारी सबके सदा