इन कुंजन विहरत नित ही नित।

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 70 of 108

इन कुंजन विहरत नित ही नित। सेवाकुंज पुंज छबि बरसत, हरषत निरखत हित जित ही तित॥ [1] जुगल किसोर रूप रसमाते, फूली सखी रहे चित ही चित। कृष्ण अली सो ये छबि जाचों, राचों परयो रहों जित ही तित॥ [2] - श्री प्रेम सखी जी प्रतिदिन कुंजन विहार। सेवाकुंज पुंज छवि वर्षा, हर्षत निखत हित ही जित ही चित.. [1] जुगल किशोर रूप रसमते, फुलि सखी रहे चित ही चित। कृष्णा अली, तो ये छवियाँ साकार हो जाएँ, जब तक बन सके मुझे अजनबी ही रहने दो.. [2] - श्री प्रेम सखी जी
हे री ! मोहि लागत वृन्दावन प्यारो।कीवे कहा पढ़वे को कहा फल