किशोरी दे वृन्दावन वास

Padavali —

Verse 2 of 9

(राग दरबारी कान्हरा एवं राग विहाग) अब मोहे धीरज नहीं राधे रानी। तुम दर्शन बिन चैन नहीं चित्त पल छिन रहूँ विलखानी॥ [1] मिलो दया कर जीवन धन अब हँस बोलो मृदु बानी। रुप माधुरी तुमरे कारण तजी लोक कुलकानी॥ [2] - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (113) (राग दरबारी कान्हड़ा एवन राग विहागा) अब मुझे धैर्य की आवश्यकता नहीं है, राधे रानी। तेरे दर्शन के बिना चैन नहीं, पल-पल छीनता मन मेरा.. [1] जीवन की दया धन से मिलो, अब धीरे बोलो, मधुर वाणी। रूपमाधुरी तेरे कारण, तजि लोक कुलकानि.. [2] - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (113)
प्रिया मैं तो हूँ चेरिन की चेरीभजौ मन राधे महारानी