जो कोऊ वृन्दावन बसि जानै
Padavali —
Verse 4 of 9
(राग सारंग)
जो कोऊ वृन्दावन बसि जानै।
सब कछु तज भजै हरि - राधा - मन पूरन पन ठानै॥
छक्यौ रहै भरि भाव निरन्तर करि लीला रस पानै।
रसिक सँग रुचि-रंग रचै नित प्रीति-रीति उर आनै॥ .
चकित नैंन चाहै द्रुम - बेली दंपति हित पहिचानै।
घूमत फिरै तीर जमुना के निधरक ह्वै गुन गानै॥
आस बास रज ही मैं राखै स्रम न करै भ्रम भानै।
आनँदघन रस भीजि रीझि सों जनम सफलता मानै॥
- श्री आनँदघन जी, पदावली (692)
(राग सारंग) जो वृन्दावन में रहना जानते हैं। सब मन से गाते हैं, हरि-राधा-मन पूरन पान ठनै.. भविष्य मेरी प्रतीक्षा कर रहा है, मैं लीला का रस लगातार पी रहा हूं। प्रेम-रस्म प्रेम और उल्लास से हर दिन रची जाती है.. पथराई आंखों को दाता की खैरियत पहचानने की जरूरत है. चलते तीर ही हैं यमुना नदी के निर्धारक.. मैं सिर्फ नियमों का पालन करता हूं और मेहनत नहीं करता, यह भ्रम जैसा लगता है. आनंदघन रस भीजी रीझी पुत्र जन्म सफलता मैनी.. - श्री आनंदघन जी, पदावली (692)