मेरौ मन बाबरौ भयौ
Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास
Verse 20 of 33
(राग धनाश्री व सारंग)
मेरौ मन बाबरौ भयौ।
लरका एक इहाँ हुतो ठाड़ो ताही के संग गयो॥ [1]
जानों नहीं कोन को ढोटा चित्र विचित्र ठयौ।
पीतांबर छबि निरख हर्यो मन पढ़ कछु मोहि दयौ॥ [2]
ग्वालिनी एक पाहुनी आई ताकी यह गति कीनी।
परमानन्द प्रभु हसत सेन दे प्रेम पागि गहि लीनी॥ [3]
- श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (430)
(राग धनाश्री वे सारंगा) मेरौ मन बबारौ भयौ। लार्का, यहाँ आओ और उसके साथ जाओ.. [1] तुम किसी को न धोने की एक अजीब तस्वीर थी। पीतानबर छवि निरख हरयौ मन पद कछु मोहि दयौ।।[2] ग्वाला अतिथि बनकर आया ताकि मैं इस आंदोलन को संगठित कर सकूं। परमानंद प्रभु हसत सेन दे प्रेम पगी गहि लिनि.. [3] - श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (430)