लगै जो श्रीवृन्दावन कौ रंग

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 19 of 33

(राग बिलावल) लगै जो श्रीवृन्दावन कौ रंग। [1] देह अभिमान सवै मिटि जावै अरु विषयन कौ संग॥ [2] सखि भाव सहज होय सजनी पुरुष भाव होय भंग। [3] श्री राधा वर सेवत सुमिरत उपजत लहर तरंग॥ [4] मन को मैल सबै छुट जई है मन सा होए अपंग। [5] ‘परमानंद’ स्वामी गुन गावत, मिट गए कोटि अनंग॥ [6] - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1374) (राग बिलावाला) जो श्री वृन्दावन में गाया जाता है। [1] सब देह-अभिमान नष्ट हो जायें, विषय-वस्तु शून्य हो जायें.. [2] मित्र सहज हो जायें, साथी विलीन हो जायें। [3] श्री राधा वर सेवत सुमिरत उपजत लहर लहर।।[4] मन की सारी धुन खो गई, मन पंगु हो गया। [5] 'परमानंद' स्वामी गुण गावत, मित गे कोटि अंग.. [6] - श्री परमानंद दास, परमानंद सागर (1374)
चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावैमेरौ मन बाबरौ भयौ